Poem on Love | प्यार पर कविता | poem on Loveletter



कितना कुछ बदल जाता है न, समय के साथ। यार-दोस्त, रिश्ते-नाते और साथ ही साथ उनके साथ संपर्क करने का तरीका भी। आज से करीब कुछ साल पहले तक लोग अपनी भावनाएं, सूचनाएं एवं विचारों को पत्र के माध्यम से दूसरों तक पहुंचाते थे परंतु मोबाइल फोन, ईमेल जैसे क्रांतिकारी संचार साधनों ने चिट्ठियों की यथार्थता एवं पत्र लेखन की परंपरा को मानों कहीं गुम सा कर दिया है। एक दौर था जब अपनों की चिट्ठियों के जवाब का बेसब्री से इंतजार किया जाता था। प्रेम-प्रसंग से जुड़े कितने ही लोग अपने दिलों की बातें चिट्ठी में तो लिख दिया करते थे उस पर टिकट भी लगा दिया करते थे परंतु उसे पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। इस कविता के माध्यम से आप आज से १५-२० साल पीछे के दौर का अनुभव करेंगे। आशा है यह कविता प्रेमपत्र (चिट्ठी) पर बहुत खूबसूरत हिंदी कविता | Love Letter Poem in Hindi  आपके मन को जरूर छू लेगी।



Poem on Love | प्यार पर कविता 

(वो गुलाबी चिट्ठी)




प्रेमपत्र (चिट्ठी) पर बहुत खूबसूरत हिंदी कविता | Love Letter Poem in Hindi |अनुप्रिया






मेरी अलसाई आंखों से नींद चुरा कर
रोम-रोम महका कर
खुशबू से तर कर
गुदगुदाकर
प्रेम में लिखी गई वह गुलाबी चिट्ठी
मुझमें अंगड़ाई ले पूछती है


क्यों बयां न कर पाया तू हाल-ए- दिल कभी
उससे,जिस पर मरा करता था कभी
फिर चुपके से कहती है
ख्वाब तेरी आंखों के
सजकर
जज्बात दिल के
प्यार की स्याही में लिपट कर
मुझ पर छप जाया करते थे कभी
गीत बन गुनगुनाते थे कभी


पर सिमट कर रह गई तेरी मैं प्रेम- पाती
काश! मैं उसके पते पर पहुंच पाती
बनकर रह गई हूं सिर्फ तेरे टूटे दिल का आईना
एक अधूरी प्रेम कहानी का नमूना
अंदर- बाहर किया करूंगी तेरी दराज से
टटोलकर तुझे,पूछती रहूंगी तेरी आज से


और समझाती रहूंगी बार-बार
मगर हो बेकरार
कि इश्क विश्क छोड़ो
तुम्हारे बस की बात नहीं।
आशिकी की राह पर चलना
डरपोकों का काम नहीं।।

                         ..... 'अनु-प्रिया'



Beautiful Poem/ Poetry/Kavita on Love  Letter (Chitthi)

(Wo Gulabi chitthi )


merii alasaaii aankhon se niind churaa kar
rom-rom mahakaa kar
khushabuu se tar kar
gudagudaakar
prem men likhii gaii vah gulaabii chiṭṭhii
mujhme angadaaii le puuchhatii hai



kyon bayaan na kar paayaa tu haal-e- dil kabhii
usase,jis par maraa karataa thaa kabhii
phir chupake se kahatii hai
khvaab terii aankhon ke
sajakar
jajbaat dil ke
pyaar kii syaahii men lipaṭ kar
mujh par chhap jaayaa karate the kabhii
giit ban gunagunaate the kabhii



par simaṭ kar rah gaii terii main prem- paatii
kaash! main usake pate par pahunch paatii
banakar rah gaii huun sirph tere ṭuuṭe dil kaa aaiinaa
ek adhuurii prem kahaanii kaa namuunaa
andar- baahar kiyaa karuungii terii daraaj se
ṭaṭolakar tujhe,puuchhatii rahuungii terii aaj se



Aur samajhaatii rahuungii baar-baar
magar ho bekaraar
ki ishk vishk chhodo
tumhaare bas kii baat nahiin.
aashikii kii raah par chalanaa
ḍarapokon kaa kaam nahiin..

                               ....... 'Anu-priya'

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