मृत्यु पर मार्मिक कविता | Emotional Poem on Death | मौत पर कविता



जीवन में मृत्यु की कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर पाना और इस परिस्थिति का सामना करना हमें अचेतन सा कर जाता है। इसी भावना को इस कविता मृत्यु पर मार्मिक कविता, Emotional Poem on Death,mrutyu: Ek sach Kavita में उजागर करने का प्रयास किया गया है। आशा है कि अनुप्रिया द्वारा रचित इस रचना से आप भी इससे अपने आपको जुड़ा हुआ महसूस करेंगे........


 मृत्यु पर मार्मिक कविता

Emotional Poem on Death



mrutyu: Ek Sach




Mrutyu ek sach | मृत्यु पर कविता very emotional poem on death in Hindi by shayari Metro



मौत पर कविता


ब्रह्मांड में सब कुछ अनंत है । जीवन न तो जन्म से शुरू होता है और न ही मृत्यु पर समाप्त होता है । जीवन और मृत्यु ईश्वर द्वारा रचित एक ऐसा अटल विधान है, जिसे हम आत्मा और परमात्मा को प्राप्त करने की आवश्यक प्रक्रिया भी कह सकते हैं। जिस प्रकार रात के बाद दिन, दिन के बाद रात आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन के अनुभवों से गुजरते हुए आत्मस्वरूप को ब्रह्म स्वरूप में लाने का जीवन-मरण का यह चक्र भी अवश्यंभावी है। मृत्यु अर्थात सोकर, थकान मिटाकर फिर से ऊर्जा, ताजगी, स्फूर्ति और शक्ति का संचार प्राप्त कर नया तन पाकर अपनी मंगलमय यात्रा पुनः प्रारंभ करना। भगवद् गीता में श्री कृष्ण द्वारा दिए गए उपदेश भी इसी तथ्य को प्रदर्शित करते हैं। हम सभी इस संदर्भ के प्रसंग से वाकिफ हैं फिर भी अपने प्रियजनों का बिछोह हमें बहुत विचलित सा कर देता है। ...



मौत पर कविता

मृत्यु - एक सच

चली जिंदगी चार कांधों पर सवार हो के
वजूद खो के ,घर- परिवार खो के।


ग्रहों का सुर-ताल बिगड़ा या
मृत्यु का मायाजाल तगड़ा
दस्तक देकर सांसों पर बार-बार
मौत ले गई उसको जैसे घुड़सवार हो के।
चली जिंदगी..........


ताउम्र ख्वाबों को पूरा करने की होड़,
तूफ़ां सा तेवर, हौसलों की दौड़
मौत से बेखबर, बन अखबार
बुझा गया चिराग वह अंधियार बो के।
चली जिंदगी...........


मृत्यु शैया पर लेटा बन अनाड़ी
मानो खुद ही हो इस खेल का खिलाड़ी
बन निर्मोही,सबमें भर गमों के गुबार
लेता अंतिम विदाई सबमें बेकरार हो के।
चली जिंदगी...........


खोखली काया चिताग्नि में बदल उठी
दावानल बन कितनों के अंतर में जल उठी
मोहपाश में जकड़े लोगों में बने अंगार
लीन हो गई कहीं निराकार हो के।
 चली जिंदगी...........

                        ‌‌                ...... 'अनु-प्रिया'



Emotional Poem/ Poetry /Kavita on Death

Mrutyu: Ek sach

chalii jindagii chaar kaandhon par savaar ho ke
vajuud kho ke ,ghar- parivaar kho ke.



grahon kaa sur-taal bigadaa yaa
mṛtyu kaa maayaajaal tagadaa
dastak dekar saanson par baar-baar
mowt le gaii usako jaise ghudasavaar ho ke.
chalii jindagii..........




taaumr khvaabon ko puuraa karane kii hod,
tuufaan saa tevar, howsalon kii dowd
mowt se bekhabar, ban akhabaar
bujhaa gayaa chiraag vah amdhiyaar bo ke.
chalii jindagii...........



mṛtyu shaiyaa par leṭaa ban anaadii
maano khud hii ho is khel kaa khilaadii
ban nirmohii,sabamen bhar gamon ke gubaar
letaa amtim vidaaii sabamen bekaraar ho ke.
chalii jindagii...........



khokhalii kaayaa chitaagni men badal uṭhii
daavaanal ban kitanon ke amtar men jal uṭhii
mohapaash men jakade logon men bane amgaar
liin ho gaii kahiin niraakaar ho ke.
 chalii jindagii...........

                        ‌‌           ...... 'anu-priya'


***

जीवन मृत्यु की सच्चाई पर कविता/poem on life- death reality


Poem on Death

तुझको ढूंढू मैं 


हर जगह ही तुझको सोचूं मैं
हर किसी में तुझको ढूंढू मैं


अनगिनत सवालों से उलझूं
मैं जाऊं कहां, किसे समझूं 
टुकड़ों से सांचा बनने तक
काया से रूह बदलने तक
सब कुछ ही अधूरा लगता है
बस खोया-खोया लगता है
अब क्या-क्या फिर से जोड़ू मैं
     हर किसी में तुझको .......


अंबर के तारों को ताकूं 
धरा अंधियारों में झांकू
कभी आसपास कभी दूर तलक
मिले कहीं नहीं तेरी एक झलक
श्मशान सा तन-मन लगता है
वीरान यह आंगन लगता है 
इस फिज़ा को कैसे मोड़ू मैं
      हर किसी में तुझको...........


खुद से पूछूं, खुद ही बोलूं 
तह बंद करुं क्या कुछ खोलूं
इस गुत्थी का कोई तोड़ नहीं
उलझन का कोई निचोड़ नहीं
कोई मरता है कोई लुटता है
ताउम्र हर घड़ी घुटता है
किसे छोड़ू, किसको पकड़ू मैं
हर किसी में तुझको.......



तेरा नया ठिकाना कैसा है
तू भीड़ में है या फिर तन्हा है
तेरी तस्वीरों से पूछूं मैं
कभी बोलूं कभी टटोलूं मैं
हंसता है या फिर रोता है
मिलने की जिद्द क्या करता है
कैसे न खुद को उधेड़ू मैं
  हर किसी में तुझको ढूंढू मैं....
        हर किसी में तुझको........


                                 ..........'अनु-प्रिया'

तुझको ढूंढू मैं | जिंदगी की कड़वी सच्चाई पर कविता | tujhko dhundhun main | emotional poem on truth of Life written by Anupriya | Shayarimetro


Kavita |Poem |Poetry on life death reality

Tujhko dhundhun main

har jagah hi tujhako sochuun mai
har kisi me tujhako ḍhunḍhu mai

anaginat savaalon se ulajhuun
mai jaaun kahaan, kise samajhun
ṭukadon se saanchaa banane tak
kaaya se ruuh badalane tak
sab kuch hi adhura lagata hai
bas khoya-khoya lagata hai
ab kya-kya phir se jodu mai
har kisi me tujhako .......

ambar ke taaron ko takun
dharaa andhiyaron men jhaanku
kabhi aaspaas kabhi door talak
mile kahiin nahin teri ek jhalak
shmashaan saa tan-man lagata hai
veeraan yah aangan lagata hai 
is fiza ko kaise modu mai
har kisi men tujhako...........

khud se puchhun, khud hi bolun
tah band karun kya kuch kholun
is gutthii kaa koii tod nahin
ulajhan kaa koi nichod nahin
koi marata hai koii luṭata hai
taumar har ghadi ghuṭata hai
kise chhoduu, kisko pakadu mai
har kisi me tujhako.......

tera naya ṭhikaana kaisa hai
tu bheed me hai ya phir tanha hai
teri tasviiron se puchhun mai
kabhi bolun kabhi ṭaṭolun mai
hansata hai ya phir rota hai
milane ki jid kya karta hai
kaise na khud ko udhedu mai

har kisi men tujhko ḍhunḍhu mai....
har kisii men tujhako........

                               ...... 'Anu-priya'

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