बचपन पर लाजवाब हिंदी कविता | Emotional Poem on Childhood | चलो टहल आते हैं




आज की भागदौड़ की जिंदगी में जहां किसी को अच्छी नींद नसीब नहीं होती वही बचपन के उन दिनों में पता ही नहीं चलता था कि कब दिन हो गई और कब रात। देश-दुनिया की खबरों से दूर बेफिक्र हो मस्ती में जीना, पूरा-पूरा दिन शोर मचाना, लड़खड़ाकर गिरना, रोना, संभलना, नोकझोंक करना, फिर से खिलखिलाकर सब कुछ भूलकर खेल में रम जाना सब कुछ आज जैसे एक खूबसूरत सपने की तरह लगता है। ऐसे में एक शायर की बहुत ही खूबसूरत पंक्तियां आंखों को भिगो जाती हैं........
चाहे दौलत भी ले लो, चाहे शोहरत भी ले लो, चाहे छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो मेरा वह बचपन, वह कागज की कश्ती वो बारिश का पानी
बचपन के इन्हीं खूबसूरत और कभी न भूलने वाले पलों को इस कविता बचपन पर लाजवाब हिंदी कविता | Emotional Poem on Childhood | चलो टहल आते हैं में उतारने की कोशिश की गई है। आशा है आप अनुप्रिया द्वारा रचित इस कविता को अवश्य पसंद करेंगे और जन-जन के मन तक पहुंचाने की चेष्टा अवश्य करेंगे।




बचपन पर लाजवाब कविता | Very Emotional Poem on Childhood | Chalo Tahal Aate Hain written by Anupriya



बचपन की यादों पर कविता



चलो टहल आते हैं



पुरानी गलियों में जाकर थोड़ा टहल आते हैं 
फुर्सत के चंद लम्हे हैं, चलो कुछ बहल आते हैं।


वह पकड़म-पकड़ाई, गुल्ली-डंडा, खो-खो का खेल
वो छुपन-छुपाई, हल्ला-गुल्ला, हमारी छुक- छुक करती रेल
यादों के झरोखों से झांक फिर से कुछ कर पहल आते हैं।
चलो,पुरानी गलियों में जाकर टहल आते हैं।।


वो बारिश के पानी में कागज की कश्ती
वह कटती पतंगे, गुड्डे-गुड़ियों संग मस्ती
सूखी पाती बटोर अपना-अपना फिर से महल बनाते हैं।
चलो, पुरानी गलियों में जाकर टहल आते हैं।।


वो दो पल का झगड़ा, लड़ फिर मुस्कुराना
वो तपती जून दोपहरी आमों पर नजर गड़ाना
छोड़ झमेले दुनियादारी के बच्चे बन मचल जाते हैं।
चलो, पुरानी गलियों में जाकर टहल आते हैं।।


वो पापा की डांटें, वो मम्मी की लोरी
भाई बहनों से तू-तू कभी थोड़ी-थोड़ी
ढूंढ़ बचपन पुराना खुद को थोड़ा बदल आते हैं।
चलो, पुरानी गलियों में जाकर टहल आते हैं।।


न कल की थी चिंता, न बीते की सतह
न रोने का कारण, न हंसने की वजह
कोई लौटा दे बचपन मेरा, जिस पर आज भी हम पिघल जाते हैं।
चलो, पुरानी गलियों में जाकर टहल आते हैं।।


                                       ........ 'अनु-प्रिया'


Bachpan Ki Yadon Per Kavita 

Emotional Hindi Poem on Childhood 

Chalo tahal aate Hain


कुछ खट्टी, कुछ मीठी, कुछ पूरी तरह से याद, तो कुछ धुंधली सी बचपन की सभी मधुर स्मृतियों की छाप हम सबके मानस पटल पर कहीं ना कहीं अंकित अवश्य होती है। सही मायने में बचपन एक ऐसा खूबसूरत पल होता है जो चाहते हुए भी न तो कभी लौटकर वापस आता है न ही इसे हम कभी भुला सकते हैं। बचपन की यादों को समेटकर इनके सहारे हम अपनी पूरी जिंदगी बिता देते हैं


बचपन की यादों पर कविता


puraanii galiyon men jaakar thodaa ṭahal aate hain 
phursat ke chand lamhe hain, chalo kuchh bahal aate hain.


vah pakadam-pakadaaii, gullii-ḍanḍaa, kho-kho kaa khel
vo chhupan-chhupaaii, hallaa-gullaa, hamaarii chhuk- chhuk karatii rel
yaadon ke jharokhon se jhaank phir se kuchh kar pahal aate hain.
chalo,puraanii galiyon men jaakar ṭahal aate hain..


vo baarish ke paanii men kaagaj kii kashtii
vah kaṭatii patange, guḍḍe-gudiyon sang mastii
suukhii paatii baṭor apanaa-apanaa phir se mahal banaate hain.
chalo, puraanii galiyon men jaakar ṭahal aate hain..


vo do pal kaa jhagadaa, lad phir muskuraanaa
vo tapatii juun dopaharii aamon par najar gadaanaa
chhod jhamele duniyaadaarii ke bachche ban machal jaate hain.
chalo, puraanii galiyon men jaakar ṭahal aate hain..


vo paapaa kii ḍaanṭen, vo mammii kii lorii
bhaaii bahanon se tuu-tuu kabhii thodii-thodii
ḍhuundh bachapan puraanaa khud ko thodaa badal aate hain.
chalo, puraanii galiyon men jaakar ṭahal aate hain..


na kal kii thii chintaa, na biite kii satah
na rone kaa kaaraṇ, na hamsane kii vajah
koii lowṭaa de bachapan meraa, jis par aaj bhii ham pighal jaate hain.
chalo, puraanii galiyon men jaakar ṭahal aate hain

                                      ....... 'anu-priya'
 
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