वसंत की धूप पर प्रेरणादायक हिंदी कविता 2024 | Basant Panchmi Kavita

 



ऋतुराज अर्थात बसंत पंचमी का स्थान सभी ऋतुओं में सर्वोपरि है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार बसंत ऋतु फाल्गुन माह से प्रारंभ हो जाता है और वैशाख माह के अंत तक रहता है। 
आज आपके समक्ष अनुप्रिया द्वारा रचित बसंत ऋतु पर सुंदर कविता- वसंत की धूप पर प्रेरणादायक हिंदी कविता(Basant Panchmi Kavita) प्रस्तुत है। इसे विद्यार्थी अपने विद्यालय के कार्यक्रमों में बसंत पंचमी के अवसर पर, सरस्वती पूजा में व सरस्वती वंदना के साथ सुना सकते हैं ।



वसंत की धूप पर प्रेरणादायक हिंदी कविता 2024 | Basant Panchmi Kavita


वसंत ऋतु पर प्रेरणादायक हिंदी कविता: बसंत की धूप | motivational Hindi poem on Basant written by Anupriya

बसंत पंचमी स्पेशल कविता

उजली-उजली सी 
मीठी-मीठी सी
चहुंओर बिखरकर
चट्टानों,मैदानों,खलिहानों में छितरकर
पेड़ों के झुरमुट से झांकती हुई
खिड़की के रास्ते मुझे सहलाती हुई
थोड़ा गुनगुन कर जाती है
मानो मुझसे कुछ कह जाती है
न धरती अंबर तपते हैं
न स्वेद तनों से झरते हैं
मैं जेठ दुपहरी घाम नहीं
अंगारों सी मेरी शाम नहीं
पतझड़ के सूखे पात नहीं
कंपन भी अब दिन-रात नहीं
न पंख फैलाती कोहरा हूं
मैं तो बस कवियों का मोहरा हूं
मैं धुप-धुप करती ढिबरी सी
जाड़े की माखन मिश्री सी
चांदी सी बस बिछ जाती हूं
कहीं फैल कहीं खिंच जाती हूं
मैं सखी नए-नए पात़ों की
कोमली सी टहनी शाखों की
कुसुमों की मोहक सुगंध में हूं
मंजूरियों की सोंधी गंध में हू
कोयल की कूक में हूं रमती
भंवरे की हूक से हूं खिलती
पीली सरसों पर परस रही
हल्दिया रंग से सरस रही
फड़फड़ा उठे जब मन आंगन
झूमने लगे जब सब तन-मन
जब आंचल पीत लहर जाए
मौसम में प्रीत सहर जाए
अंगड़ाई ले जाग उठे यौवन
प्रेम प्रसून खिल उठे अंतर्मन
मैं मंद बयार का हाथ पकड़
प्रियतमा जैसे संग सुघड़
बस लहराई सी जाती हूं
सबमें समायी सी जाती हूं
मनभावन करने वाली हूं
सूनापन हरने वाली हूं
क्यों खोए-खोए से लगते हो
बिछुड़न में रोए से लगते हो
माना पगडंडी टेढ़ी हैं
कहीं फिसलन है कहीं रेड़ी हैं
क्यों धुला-धुला सा मुखड़ा है
जाने कितनों का दुखड़ा है
अंदर की धूप में नहीं सुलग
मत रह विलग, कुछ कर अलग
लंबी लकीर बन चलता जा
तू शूरवीर है बढ़ता जा
गर धीरज तेरा न डोलेगा
गम का सूरज भी डूबेगा
पिघला दूंगी अवसादों को
पीड़ा से भरे गुबारों को
बस मुझसे हाथ मिला ले तू
प्रकृति को गले लगा ले तू
खिला दूंगी तेरा श्यामल रंग-रूप
क्योंकि मैं हूं बसंत की धूप
मैं हूं बसंत की धूप

                                          ......'अनु-प्रिया'
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बसंत पंचमी स्पेशल कविता| Basant Panchami Special Kavita

Basant Ki Dhup


बसंत ऋतु के समय वसुधा अपना श्रृंगार करती है। सर्दियों गर्मियों के बीच के इस सुहावना समय के आगमन के साथ प्रकृति में कई बदलाव होते हैं।पेड़ों की शाखाओं पर नई कोंपले फूटती हैं, शरद ऋतु के कारण वीरान हुए पेड़ अपनी आभा पाने लगते हैं, रंग बिरंगे फूलों से उपवन महक उठते हैं आम के वृक्ष बौर से लद जाते हैं । कोयल,बुलबुल,पपीहा पक्षियों का चहचहाना ऐसा लगता है मानो वे सब बसंत ऋतु का स्वागत कर रही हों। पीले परिधान, पीली सरसों , पीली पतंगे, पीले-केसरिया रंग के व्यंजन से वातावरण और रंगीन हो जाता है। हर तरफ जोश, उल्लास, उत्साह का संचार होता है। किसान का मन अपनी लहलहाती फसलों को देखकर आनंदित हो जाता है । कवियों का तो यह अपना पसंदीदा विषय है। बसंत ऋतु ईश्वर द्वारा दिया गया अनमोल वरदान है जो नैसर्गिक सौंदर्य को बढ़ाकर कण-कण में खुशी भर जाता है।


Best Poem on Basant Panchami 

बसंत ऋतु पर सुंदर कविता



ujali-ujali si
miṭhi-miṭhi si
Chahunoor bikharkar
chaṭṭaanon,maidaanon,khalihaanon m chhitarakar
pedon ke jhuramuṭ se jhaankati hui
khidaki ke raaste mujhe sahalaati hui
thoda gungun kar jaati hai
maano mujhse kuch kah jaati hai
na dharati ambar tapte hain
na sved tanon se jharate hain
mai jeṭh dupahari ghaam nahiin
amgaaron sii meri shaam nahin
patjhad ke sukhe paat nahin
kampan bhi ab din-raat nahin
na pankh phailati kohara hun
mai to bas kaviyon ka mohara hun
mai dhup-dhup karati ḍhibari si
jaade ki maakhan mishri si
chaandi si bas bich jaati hun
kahin phail kahin khinch jaati hun
mai sakhi naye-naye paaton ki
komali si ṭahani shaakhon ki
kusumon ki mohak sugandh me hun
manjuuriyon ki sondhi gandh me hun
koyal ki kuuk me hun ramati
bhanvare ki huuk se hun khilati
peeli sarason par paras rahi
haldiyaa rang se saras rahi
phadphada  uṭhe jab man aangan
jhuumane lage jab sab tan-man
jab aanchal peet lahar jaye
mousam me preet sahar jaye
angadaai le jaag uṭhe yowvan
prem prasun khil uṭhe antarman
mai mand bayaar ka haath pakad
priyatama jaise sang sughad
bas laharaai si jaati hun
sabme samaayi si jaati hun
manbhaavan karne wali hun
sunapan harne wali hun
kyon khoe-khoe se lagte ho
bichhudan men roye se lagte ho
maana pagḍanḍi ṭedhi hain
kahin phislan hai kahin redi hain
kyon dhula-dhula sa mukhada hai
jaane kitanon kaa dukhada hai
andar ki dhuup me nahin sulag
mat rah vilag, kuch kar alag
lambi lakeer ban chalata jaa
tu shoorveer hai badhata ja
gar dheeraj tera na ḍolega
gam ka suraj bhii ḍubega
pighala dungi avasaadon ko
peeda se bhare gubaaron ko
bas mujhse haath mila le tu
prakṛti ko gale laga le tu
khila duungi tera shyaamal rang-roop
kyonki mai hun basant ki dhoop
mai hun basant ki dhoop

                                           ...... 'Anu-priya'

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