- •Poem on Politics in Hindi | राजनीति पर हिंदी कविता
- •Best Heart touching Poem Kavita in Hindi
- •Best Political Poem in hindi(Rajniti per Hindi kavita)
- •Short Poem on Nature in Hindi
- •Short poem on election in Hindi चुनाव पर कविता हिंदी में
- •Short Poem on Newspaper in Hindi :
- •Short Poem on Happy New year | नए वर्ष पर हिंदी कविता
- •Short Poem on Old Age in Hindi बुढ़ापे पर हिंदी कविता
- •Short Poem on Basant Panchami बसंत ऋतु पर छोटी सी कविता
- •नए जमाने की कविता:–डिजिटल जमाना
- •Best Poem in Hindi :-
- •आज के जमाने पर कविताकोहराम क्यों है?
Poem on Politics in Hindi | राजनीति पर हिंदी कविता

Best Heart touching Poem Kavita in Hindi
Best Political Poem in hindi(Rajniti per Hindi kavita)
यह कुर्सी भी कितनी दलाल बन गई,
जाते जाते कितना गोलमाल कर गई।
अब तक सजती थी जिनकी चौपाले यहां,
उनके खिलाफ ही हड़ताल कर गई।
इलाका थर्राता था कभी दहशत से जिनके,
उन शेरों को अब यह घड़ियाल कर गई।
लिबास ओढ़े रहती है शराफत का हरदम,
न जाने कितनों के लिए मिसाल बन गई।
जादू भरा है नस-नस में इसकी,
कितनों के मन में यह उबाल कर गई।
उतरे जो इससे वह भूत हो गए,
बैठे जो उसका भविष्य काल हो गई।
राजनीति की कुर्सी का भी जवाब नहीं साहिब,
किसी को भौकाल,किसी को कंगाल कर गई।।
-‘अनु-प्रिया’***
Short Poem on Nature in Hindi
प्रकृति की छटा हर तरफ छाई हुई है,
पहाड़ों सी ऊंचाई तो
सागर सी गहराई समाई हुई है।।
खेत-खलिहानों का लहलहाना
चुलबुल नादान पंछियों का फुदक-फुदक गाना
डाली-डाली फूलों की भी इठलाई हुई है।
प्रकृति की छटा हर तरफ छाई हुई है।।
मदमस्त हवाओं की सरसराहट
प्यास बुझाती टेढ़ी-मेढ़ी नदियों की कल-कलाहट
जिनकी महिमा वेदो में भी गाई हुई है।
प्रकृति की छटा हर तरफ छाई हुई है।।अंधियारी रातों में तारों का टिमटिमाना
आकाश का नीले-काले-सफेद बादलों से घिर जाना
रात मानो कितने ही रंगों से नहाई हुई है।
प्रकृति की छटा हर तरफ छाई हुई है।।
……..’अनु-प्रिया’
Short poem on election in Hindi चुनाव पर कविता हिंदी में
अंदाज़ जुदा सा है कोई दांव तो नहीं
हर कोई खुदा सा है ,कहीं चुनाव तो नहीं।
रैलियों पर रैली, बैनर ,चुनावी पर्चियां
वोटों की मंडी सजाने का कोई दुराव तो नहीं।
कसमे-वादों के डंके बजने लगे हैं शहर भर में
प्रलोभनकारियों का कुर्सियों से कहीं लगाव तो नहीं।
धक्का-मुक्की के बीच ताबड़तोड़ बजती तालियां
चुनावी हथकंडों का गलत इरादों से कोई जुड़ाव तो नहीं।
चिकनी-चुपड़ी बातें मलकर वोटों का होता मोल- भाव
सियासी षड्यंत्रों का कोई जलता अलाव तो नहीं।
झोले,थैले,बक्से तक आतुर हैं किसी जुगाड़ में
तोहफे में इनको मिल रहा कोई घाव तो नहीं।
“होगा बदलाव अबकी बार, जब चुनेंगे हमारी सरकार
“शाही पुलाव परोसने वाले कहीं, ये ऊदबिलाव तो नही।
सियासी खेलों के मंझे खिलाड़ी छुपाते हैं, हर गुनाह अपने
इनका यूं चुनावी रंग में रंगना, कहीं कोई बचाव तो नहीं।
…..’अनु-प्रिया’
Short Poem on Newspaper in Hindi :
सुबह होते ही खबरों से प्यार शुरू हो जाता है
हर घर में चाय के साथ अखबार शुरू हो जाता है।
राजनीति की चर्चाओं से गरमा- गरम यह रहते हैंबेकारी- गरीबी जैसे मुद्दों का भंडार शुरू हो जाता है।
अर्थव्यवस्था वाला कॉलम घटता-बढ़ता रहता हैरुपया-डॉलर की घटा-बढ़ी का कारोबार शुरू हो जाता है।
दुर्घटना ,मर्डर, रेप खबर सुन मन विचलित हो जाता हैकुछ पर तूल पकड़ नेताओं में हाहाकार शुरू हो जाता है।
वैवाहिक विज्ञापन तो जैसे भूले -भटके लगते हैंपर वर- वधू के संगम का प्रवेश- द्वार शुरू हो जाता है।
मनोरंजन वाले पन्ने जैसे पांव पसारे बैठे हैंहॉलीवुड- बॉलीवुड का मानो व्यापार शुरू हो जाता है।
इश्तिहार भी जगह ढूंढता और मचलता छपने कोहफ्तों से बाट निहार रहा, नित दरकार शुरू हो जाता है।
खेल-जगत का पन्ना भी अपना परचम लहराता हैजीते तो उपहार नहीं तो उपचार शुरू हो जाता है।
लोकतंत्र की मर्यादा इससे ही पहचानी जाती हैदेश की ताकत का अंदाजा सीमा पार शुरू हो जाता है।
…….’अनु-प्रिया’
Short Poem on Happy New year | नए वर्ष पर हिंदी कविता
बिगुल बजाकर जीवन- रण में
अपना कदम बढ़ाते रहना।
हे मानुष! तुम कर्मपुरुष बन
संघर्षों से टकराते रहना ।
खर्च कर पसीने की बूंदे
शोहरत- नाम कमाते रहना।
प्रेम की परिभाषा को गढ़कर
रिश्ते मधुर बनाते रहना।
अंतरतम तक हो उत्साहित
अंतर भेद मिटाते रहना।
दृढ़ निश्चय की लगा चिंगारी
मेहनत को सुलगाते रहना।
कर लोगे हर सपने को सच
सोच नई अपनाते रहना।
जीवन रूपी महायज्ञ को
कोशिश कर सफल बनाते रहना।
सूरज जैसा तेजस्वी बन
अपना परचम लहराते रहना।
अविरल बहती नदियों से तुम
रोड़े राह हटाते रहना।
कैसे चढ़ना शिखर बताते
हिम्मत आप चढ़ाते रहना।
श्रमजीवी चींटी जैसे तुम
प्रतिपल कदम बढ़ाते रहना।
क्रीड़ारत विकल विहंग से
आशा के पंख फैलाते रहना।
उमड़-उमड़ बरसा बहार
साप्रेम-सुधा बरसाते रहना।
रतन लुटाती वसुंधरा सा
सबका मान बढ़ाते रहना।
फूलों की सुगंध को भर
जीवन बगिया महकाते रहना।
नए वर्ष की नई बेला पर
नई चेतना, नई उमंग संग
सपनों की पाखी में भर तुम,
हौसलों को उफनाते रहना।।
…… ‘अनु-प्रिया’
Short Poem on Old Age in Hindi बुढ़ापे पर हिंदी कविता
अंतकरण मेरे अंतरद्वंद मचा सा
दिशाविहीन उसकी मुखाकृति को
अनिमेष देखता रहा मैं
थोड़ा मिला- अनमिला सा
जिज्ञासाओं का चल पड़ा मानों
साक्षात् काफिला सा
अंगुलियों के पोरों से दर्पण पर
पसरी धूल को उकेरता रहा मैं
कुछ अचंभित ठगा- ठगा सा
अनिमेष देखता रहा मैं।।
धुंधलाता ऐनकबालों पर सफेदी
झुके से कंधे, फीकी होती रौनक
काम के बोझ तले दबती
उसकी अतृप्त अभिलाषाओं को
महसूस करता रहा मैं।
कुछ अचंभित, ठगा -ठगा सा
अनिमेष देखता रहा मैं।।
न कर मलाल,
यूं मत रह जग से
अलग-थलग- विलग हो
अनंत दीप बन प्रकाशमान कर सबको,
बस तू जगमग हो
उसके ख्वाबों की खनक की कसक को
थोड़ा सा टीसता रहा मैं।
कुछ अचंभित, ठगा-ठगा सा
अनिमेष देखता रहा मैं।।
बुढ़ापे की सनक हो चली तुझ पर भारी है
मैं तेरा प्रतिबिंब हूं पगले
यह तेरी लाचारी लाइलाज बीमारी है
जवानी में बहकते देखा था लोगों को,
बुढ़ापे में खुद को बहकते देखता रहा मैं।
कुछ अचंभित, ठगा-ठगा सा
अनिमेष देखता रहा मैं।।
…….. ‘अनु-प्रिया’
Short Poem on Basant Panchami बसंत ऋतु पर छोटी सी कविता
चहुंओर बिखरकरचट्टानों,मैदानों,खलिहानों में छितरकर
पेड़ों के झुरमुट से झांकती हुई
खिड़की के रास्ते मुझे सहलाती हुई
थोड़ा गुनगुन कर जाती है
मानो मुझसे कुछ कह जाती है
न स्वेद तनों से झरते हैं
मैं जेठ दुपहरी घाम नहीं
अंगारों सी मेरी शाम नहीं
पतझड़ के सूखे पात नहीं
कंपन भी अब दिन-रात नहीं
न पंख फैलाती कोहरा हूं
मैं तो बस कवियों का मोहरा हूं
जाड़े की माखन मिश्री सी
चांदी सी बस बिछ जाती हूं
कहीं फैल कहीं खिंच जाती हूं
मैं सखी नए-नए पात़ों की
कोमली सी टहनी शाखों की
कुसुमों की मोहक सुगंध में हूं
मंजूरियों की सोंधी गंध में हू
कोयल की कूक में हूं रमती
भंवरे की हूक से हूं खिलती
पीली सरसों पर परस रही
हल्दिया रंग से सरस रही
फड़फड़ा उठे जब मन आंगन
झूमने लगे जब सब तन-मन
जब आंचल पीत लहर जाए
मौसम में प्रीत सहर जाए
अंगड़ाई ले जाग उठे यौवन
प्रेम प्रसून खिल उठे अंतर्मन
मैं मंद बयार का हाथ पकड़
प्रियतमा जैसे संग सुघड़
बस लहराई सी जाती हूं
सबमें समायी सी जाती हूं
मनभावन करने वाली हूं
सूनापन हरने वाली हूं
क्यों खोए-खोए से लगते हो
वक्त कुछ नया आजमाने को है।
पसेर दी है ओस पूरे बरस की
धूप बस रत्ती भर ही गुनगुनाने को है।
आया दिसंबर….
घोल दी है मिश्री जैसे चमन भर में
पैगाम- ए- अमन शहर भर में बिखर जाने को है।
आया दिसंबर…….
चुस्कियों से कर दी है सांसे गर्म
दिल दुबककर रजाइयों में बेखबर हो जाने को है।
आया दिसंबर……
सजा दिए हैं सर्द रूखे से चेहरे भी
धकेल गमों को पीछे समय अब निखर जाने को है।
आया दिसंबर……..
हलचल सी मचा दी है किसी के स्वागत पर
दिन, साल, महीना सब कुछ बदल जाने को है।
आया दिसंबर………
आतुर से हैं कहीं रच जाने,छप जाने को
क्या तकदीर मेरी भी कल चमचमाने को है।
आया दिसंबर……….
डिजिटल जमाना जहां तकनीकी उन्नति और संचार के लिए एक आधुनिक युग है, वहीं इसकी कई बुराइयां भी हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि लोगों के बीच सामाजिक संवाद, आपसी मेल-जोल की कमी होती जा रही है। लोग अक्सर अपने तकनीकी उपकरणों में इतने डूबे रहते हैं कि वे अपने पास के लोगों से कई कई दिनों तक नहीं मिलते।। व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ, इसने साइबर बुलिंग, डाटा चोरी, और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी समस्याओं को भी बढ़ावा दिया है। डिजिटल जमाने की इन्हीं सभी कमियों को कविता के माध्यम से उजागर किया गया है।
नए जमाने की कविता:–डिजिटल जमाना
Simple नहीं, बड़ा critical है।
उनके लिए Doraemon ,Chhota Bheem बड़े Actual हैं।
पर अब तो वे बस किताबों में ही रह गए role model हैं।
अब तो हर कोई single और special है।
रह गए तो सिर्फ गिरगिट और eagle हैं।
शायद ही कोई कोना यहां loyal है।
बस छोटी-छोटी जंग ही उनके लिए final हैं।